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शब्दयोग सत्संग
२० फ़रवरी, २०१७
अद्वैत बोधस्थल, नॉएडा
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा |निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः || ३० ||
अपने चित्त को आत्मा में स्थिर करके, सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें समर्पित करके, आशारहित, ममतारहित और संतापरहित होकर युद्ध कर।
(अध्याय ३, श्लोक ३०)
ये ते मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः | श्रद्धावन्तोSनसूयन्तो मुच्यन्ते तेSपि कर्मभिः || ३१ ||
जो मनुष्य दोषदृष्टि रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का नित्य पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
(अध्याय ३, श्लोक ३१)
प्रसंग:
श्री कृष्ण अर्जुन को आशारहित, ममतारहित, संतापरहित होकर युद्ध करने को क्यों बोल रहे है?
श्री कृष्ण किस कर्म को समर्पित करने को कह रहें है?
कर्मों के बंधन से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है?
"चित" कहने का क्या आशय है?
चित को आत्मा में स्थिर कैसे रखें?